अंबिकापुर में मानसून के साथ खरीफ फसलों की बुवाई और रोपाई तेज हो गई है, जिसमें धान, उड़द, सोयाबीन और मक्का प्रमुख हैं। बारिश से फसलों को लाभ मिलता है, लेकिन नमी और जलभराव के कारण जड़ सड़न, झुलसा रोग और कीटों का खतरा भी बढ़ जाता है। ऐसे में किसान अब रासायनिक दवाओं की बजाय बायोपेस्टिसाइड्स जैसे जैव कीटनाशकों की ओर रुख कर रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार इनका उपयोग खेती की लागत को कम करता है और मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार लाता है। विशेषज्ञों ने बताया कि बीजोपचार, जड़ उपचार, भूमि उपचार और पत्तियों पर छिड़काव जैसे तरीकों से इनका प्रभावी उपयोग किया जा सकता है। ट्राइकोडर्मा और स्यूडोमोनास जैसे जैव घटक बीज और पौधों को रोगों से बचाते हैं। ये हानिकारक कीटों और फफूंद को रोककर पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं। साथ ही ये पर्यावरण और मित्र कीटों जैसे मधुमक्खी व केंचुओं को नुकसान नहीं पहुंचाते। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि रोकथाम आधारित यह तरीका लंबे समय में टिकाऊ खेती को बढ़ावा देता है। किसानों को सलाह दी गई है कि वे प्रमाणित और सीलबंद जैव उत्पादों का ही उपयोग करें। सरकारी संस्थानों और कृषि विज्ञान केंद्रों से इन उत्पादों की खरीद की जा सकती है।
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