कोलकाता में लोकतांत्रिक स्थानों के सिकुड़ते दायरे को लेकर बहस छिड़ गई है। राजनीतिक विश्लेषकों और नागरिकों के अनुसार, सड़कों पर प्रदर्शन, विरोध प्रदर्शन और सार्वजनिक बहस के लिए पहले जो स्थान हुआ करते थे, वे अब या तो गायब हो रहे हैं या उन पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है। शहर के कई इलाकों में बिना पूर्व अनुमति के सार्वजनिक सभा करना मुश्किल हो गया है। प्रेस स्वतंत्रता पर भी अंकुश लगने की आशंका व्यक्त की जा रही है। विपक्षी दलों का आरोप है कि प्रशासन और पुलिस विरोध प्रदर्शनों को दबाने में सरकार की ढाल बन रही है। हाल के दिनों में विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस द्वारा कई कार्यकर्ताओं को हिरासत में लेने की घटनाएं बढ़ गई हैं। सोशल मीडिया पर भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाम लगने की आशंकाएं जताई जा रही हैं। शहर के बुद्धिजीवियों ने इस प्रवृत्ति पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि लोकतंत्र के जीवित रहने के लिए खुली बहस और असहमति की जगह होना जरूरी है। इस मुद्दे पर सरकार का कहना है कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए ये कदम जरूरी हैं। हालांकि, आम लोगों में इस बात को लेकर डर और निराशा बढ़ रही है।
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