रूस और तालिबान के बीच हाल में हुए सैन्य समझौते ने दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। यह समझौता अफगानिस्तान की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करेगा, खासकर पाकिस्तान के साथ हाल के तनाव के मद्देनजर। मॉस्को इस समझौते के जरिए तालिबान की मदद से आईएस-के जैसे आतंकी समूहों का मुकाबला करना चाहता है, जो मध्य एशिया के लिए खतरा हैं। मध्य एशिया को पारंपरिक रूप से रूस का रणनीतिक पिछवाड़ा माना जाता है। यह समझौता पाकिस्तान को कमजोर कर सकता है, क्योंकि उसकी पिछली रणनीति अफगानिस्तान में तालिबान पर निर्भर थी। भारत के लिए यह एक मौका हो सकता है, क्योंकि इससे पाकिस्तान समर्थित तत्वों पर दबाव बढ़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस समझौते से रूस की दक्षिण एशिया में बढ़ती उपस्थिति का इशारा मिलता है। हालाँकि, तालिबान की मानवाधिकार स्थिति पर अभी भी अंतरराष्ट्रीय चिंताएं बनी हुई हैं। अमेरिका ने इस समझौते पर अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि यह समझौता किस दिशा में मुड़ता है।
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