इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया कि हुक्का बार चलाना कोई मौलिक अधिकार नहीं है। अदालत ने कहा कि लोगों के स्वास्थ्य और सार्वजनिक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ऐसे कारोबारों पर रोक लगा सकती है या सख्त नियम बना सकती है। याचिका में दावा किया गया था कि हुक्का बार चलाना व्यापार की स्वतंत्रता के अंतर्गत आता है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत संरक्षण प्राप्त है। कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। न्यायालय ने कहा कि राज्य का यह कर्तव्य है कि वह नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा करे। हुक्का पीने से कैंसर, हृदय रोग और सांस की गंभीर बीमारियाँ हो सकती हैं। यह केवल व्यक्ति को ही नहीं, बल्कि आसपास के लोगों को भी नुकसान पहुँचाता है। इसलिए, राज्य हुक्का बार जैसे प्रतिष्ठानों पर प्रतिबंध लगाने के लिए पूरी तरह से सक्षम है। अदालत ने यह भी कहा कि कोई भी व्यक्ति अपने व्यापार को इस तरह से नहीं चला सकता कि उससे दूसरों के जीवन और स्वास्थ्य को खतरा हो। यह फैसला सार्वजनिक स्वास्थ्य को व्यापारिक अधिकारों से ऊपर रखता है। हुक्का बार संचालकों के लिए यह एक बड़ा झटका है। राज्य सरकारें अब इस फैसले के बाद आसानी से हुक्का बार पर प्रतिबंध लगा सकती हैं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि नियमों का उल्लंघन करने पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। यह निर्णय युवाओं को नशे की ओर बढ़ने से रोकने में मददगार होगा। कई राज्यों में हुक्का बार तेजी से बढ़ रहे हैं, जिसे लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञ चिंतित थे। अब प्रशासन के पास इन पर कार्रवाई करने का कानूनी आधार मजबूत हो गया है। इस फैसले की स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और अभिभावकों ने सराहना की है।
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