सुप्रीम कोर्ट नें स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि बैंक बड़े कर्जदारों के मामले में नरम रवैया अपनाते हैं, लेकिन आम लोगों से सख्ती करते हैं। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने एक विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई के दौरान की। याचिका एम/एस भास्कर इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड और अन्य ने SBI के खिलाफ दायर की थी। कंपनी डिफॉल्टर थी और उसने बैंक से राहत मांगी थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी को राहत देने से साफ इनकार कर दिया। न्यायालय ने कहा कि बैंकिंग प्रणाली में दोहरा मापदंड नहीं होना चाहिए। बड़े कॉर्पोरेट डिफॉल्टरों के साथ नरमी बरतना छोटे उधारकर्ताओं के साथ अन्याय है। कोर्ट ने SBI को यह भी सुनाया कि वह अपनी वसूली नीतियों पर पुनर्विचार करे। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कानून सबके लिए समान है, चाहे वह बड़ा उद्योगपति हो या आम नागरिक। इस फैसले से बैंकों की मनमानी पर अंकुश लगने की उम्मीद है। साथ ही, यह आम लोगों के लिए बैंकिंग सेवाओं में निष्पक्षता की मांग को बल देता है। अदालत का यह रुख वित्तीय न्याय की दिशा में एक सकारात्मक संकेत है। अब बैंकों को बड़े और छोटे सभी ग्राहकों के साथ एक समान व्यवहार करना होगा।
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