नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह को पद संभाले दो महीने ही हुए हैं, लेकिन उनकी सरकार पहले से ही आलोचनाओं के घेरे में आ गई है। युवाओं के बीच लोकप्रिय रहे बालेन शाह ने कई बड़े सुधारों का वादा किया था। हालांकि अब उनके कई अहम वादे तय समयसीमा से पीछे बताए जा रहे हैं। विपक्ष और राजनीतिक विश्लेषक उनकी कार्यशैली पर सवाल उठा रहे हैं। सरकार को कैबिनेट में अस्थिरता और प्रशासनिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। कुछ फैसलों को लेकर कानूनी विवाद भी सामने आए हैं। आलोचकों का आरोप है कि बालेन शाह कई मामलों में संस्थागत प्रक्रियाओं को नजरअंदाज कर रहे हैं। उनकी कुछ सख्त कार्रवाईयों को लेकर भी विवाद खड़ा हुआ है। समर्थकों का कहना है कि वह तेज बदलाव लाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि विरोधियों का मानना है कि उनकी शैली टकराव पैदा कर रही है। जनरेशन Z के बीच लोकप्रियता हासिल करने वाले शाह से लोगों की अपेक्षाएं काफी ज्यादा थीं। अब जनता उनकी घोषणाओं और जमीनी काम के बीच अंतर पर सवाल उठा रही है। राजनीतिक जानकारों के अनुसार शुरुआती महीनों का प्रदर्शन सरकार की विश्वसनीयता तय करने में अहम होता है। बालेन शाह की सरकार के सामने अब वादों को अमल में बदलने की बड़ी चुनौती है। आने वाले समय में उनकी नेतृत्व क्षमता और प्रशासनिक रणनीति की कड़ी परीक्षा होने वाली है।
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