सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी भी नागरिक के न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के अधिकार को सरकार या किसी एकमुश्त समझौते (ओटीएस) के जरिए सीमित नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक उपाय प्राप्त करना नागरिकों का मूल कानूनी अधिकार है। मामला हरियाणा के पंचकूला में भूमि अधिग्रहण से जुड़ा है। लगभग चार दशक पहले राज्य सरकार ने सेक्टर 24 से 28 के विकास के लिए 1,500 एकड़ से अधिक भूमि अधिग्रहित की थी। बाद में इस भूमि पर विकसित भूखंड विभिन्न व्यक्तियों को आवंटित किए गए। समय के साथ किसानों को दी जाने वाली भूमि मुआवजा राशि में कई बार बढ़ोतरी की गई। विभिन्न प्राधिकरणों और न्यायिक आदेशों के कारण मुआवजे की राशि लगातार बढ़ती रही। इसके बाद हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (एचएसवीपी) ने भूखंड खरीदारों को अतिरिक्त भुगतान की मांग संबंधी नोटिस जारी किए। यह अतिरिक्त राशि बढ़े हुए भूमि मुआवजे के अनुरूप भूखंडों की कीमत में वृद्धि के रूप में मांगी गई थी। विवाद इसी अतिरिक्त मांग और उससे जुड़े अधिकारों को लेकर उत्पन्न हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान नागरिकों के कानूनी अधिकारों की रक्षा पर जोर दिया। अदालत ने कहा कि किसी समझौते या प्रशासनिक व्यवस्था के आधार पर न्यायिक समीक्षा का अधिकार समाप्त नहीं किया जा सकता।
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