यह मामला दिल्ली में एक दुकान के किरायेदार और उसके मकान मालिक दंपति के बीच विवाद से जुड़ा है। किरायेदार ने वर्ष 2014 में 238.38 वर्ग फुट की दुकान किराए पर ली थी। दुकान का मासिक किराया 25,500 रुपये तय किया गया था। दोनों पक्षों के बीच 11 महीने का किरायानामा बनाया गया था। हालांकि, इस किरायानामे का पंजीकरण नहीं कराया गया था। किरायेदार ने दावा किया कि उसने नवंबर 2016 से मार्च 2017 के बीच मकान मालिकों को सुरक्षा जमा के रूप में 10 लाख रुपये नकद दिए थे। बाद में दुकान खाली करने और सुरक्षा राशि लौटाने को लेकर विवाद खड़ा हो गया। किरायेदार का आरोप था कि मकान मालिकों ने उसकी जमा राशि वापस नहीं की। उसने यह भी दावा किया कि मकान मालिक दुकान खाली कराने की मांग कर रहे थे। मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने किरायेदार के दावे और दुकान पर उसके कब्जे से जुड़े पहलुओं पर विचार किया। अदालत ने अनधिकृत रूप से दुकान में रहने के लिए भुगतान करने का आदेश दिया। इस फैसले से किरायेदार को राहत नहीं मिली और उसे अनधिकृत कब्जे की अवधि के लिए रकम चुकानी होगी।
Source: Source