मद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में एलएल.एम. की छात्रा को अपना शोध प्रबंध (डिसर्टेशन) जमा करने के लिए अतिरिक्त समय देने का निर्देश दिया है। अदालत ने माना कि गर्भावस्था और नवजात शिशु की देखभाल एक वैध कारण है, जिसके आधार पर देरी को स्वीकार किया जाना चाहिए। उच्च न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि शैक्षणिक नियमों में असाधारण परिस्थितियों के लिए लचीलापन होना आवश्यक है, विशेषकर उन महिलाओं के लिए जो जैविक और सामाजिक चुनौतियों का सामना कर रही हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि छात्रा को समय विस्तार देने से शैक्षणिक मानकों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा, क्योंकि उसे अभी भी मौखिक परीक्षा (वाइवा) उत्तीर्ण करनी होगी। यह आदेश शिक्षा के क्षेत्र में लैंगिक संवेदनशीलता और समावेशिता की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। न्यायपीठ ने शैक्षणिक संस्थानों को सलाह दी है कि वे छात्रों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाएं। छात्रा के लिए यह राहत किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है, क्योंकि इससे उसका शैक्षणिक भविष्य सुरक्षित हो गया है। इस फैसले की कानूनी हलकों में व्यापक प्रशंसा हो रही है।
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