सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश उज्जल भुइयां ने लोकतंत्र में नागरिकों के सवाल पूछने के अधिकार को महत्वपूर्ण बताया है। उन्होंने कहा कि सरकारों को नागरिकों की बात सुननी चाहिए और असहमति के लिए जगह देनी चाहिए। उनके अनुसार सवाल करना नागरिकता और स्वतंत्रता की अहम अभिव्यक्ति है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति को विद्रोह या अवज्ञा नहीं माना जाना चाहिए। विश्वविद्यालयों को स्वतंत्र सोच विकसित करने और छात्रों को कठिन सवाल पूछने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा कि असहमति को दबाने या दंडित करने से संवैधानिक व्यवस्था कमजोर होती है। उन्होंने लोकतंत्र में असहिष्णुता को गंभीर चुनौती बताया। उनके मुताबिक किसी लोकतंत्र की परिपक्वता इस बात से तय होती है कि वह अलोकप्रिय विचारों के साथ कैसा व्यवहार करता है। उन्होंने नागरिकों के स्वतंत्र विचार और सवाल करने की क्षमता को लोकतांत्रिक समाज की ताकत बताया। सरकारों और संस्थानों के लिए आलोचनात्मक आवाजों को सुनना जरूरी है। विश्वविद्यालयों में खुली बहस और विचारों के आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। असहमति को स्वीकार करना लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए आवश्यक है।
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