दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि हर वैवाहिक विवाद के बाद पहले से खारिज की गई FIR को दोबारा खोला जाने लगे, तो किसी भी समझौते के आधार पर दिया गया निर्णय अंतिम नहीं रह पाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि निपटाए जा चुके आपराधिक मामलों को बार-बार पुनर्जीवित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। यह टिप्पणी एक ऐसे मामले की सुनवाई के दौरान आई जिसमें वैवाहिक विवाद के बाद FIR को फिर से बहाल करने की मांग की गई थी। कोर्ट ने अपने पूर्व आदेश को वापस लेने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि समझौते के आधार पर रद्द किए गए मामलों में अंतिमता बनाए रखना जरूरी है। यदि ऐसे मामलों को बार-बार खोला जाएगा तो न्यायिक प्रक्रिया की स्थिरता प्रभावित होगी। यह निर्णय वैवाहिक विवादों और आपराधिक मामलों के बीच सीमाओं को स्पष्ट करता है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि कानून का दुरुपयोग रोकना आवश्यक है। इस फैसले को कानूनी व्यवस्था में स्थिरता सुनिश्चित करने वाला माना जा रहा है। मामले में दिए गए आदेश से भविष्य के समान मामलों पर भी प्रभाव पड़ सकता है। अदालत ने कहा कि न्यायिक आदेशों की अंतिमता को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
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