राजस्थान हाईकोर्ट ने एक तलाक मामले में पति की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उसने पत्नी के नार्को-एनालिसिस, पॉलीग्राफ और डीएनए टेस्ट की मांग की थी। पति ने यह मांग पत्नी द्वारा लगाए गए यौन अक्षमता के आरोपों का खंडन करने के लिए की थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे परीक्षण बिना सहमति के किसी भी व्यक्ति पर जबरन नहीं कराए जा सकते। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह याचिका काफी देर से दाखिल की गई थी, जब मामले में साक्ष्य प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी। इसलिए इसे स्वीकार करना उचित नहीं था। अदालत ने माना कि विवाद के निपटारे के लिए इन परीक्षणों की आवश्यकता नहीं है। फैसले में यह भी कहा गया कि वैवाहिक मामलों में संवेदनशील आरोपों का मूल्यांकन उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिए। न्यायालय ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गोपनीयता के अधिकार को महत्वपूर्ण बताया। यह मामला तलाक विवाद और यौन अक्षमता के आरोपों से जुड़ा था। अदालत के इस निर्णय को व्यक्तिगत अधिकारों की सुरक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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