भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में उन जोड़ों को राहत दी है जिन्होंने नए आयु प्रतिबंध लागू होने से पहले सरोगेसी (सरोगेट मदर के जरिए माता-पिता बनने) की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। कोर्ट ने सरोगेसी अधिनियम के तहत तय की गई उम्र सीमा को बरकरार रखते हुए, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तियों की प्रजनन स्वायत्तता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को भी मान्यता दी है। विजया कुमारी मामले में आया यह निर्णय व्यक्तिगत स्वतंत्रता और बच्चे के कल्याण की रक्षा करने के राज्य के कर्तव्य के बीच चल रहे टकराव को उजागर करता है। इस फैसले ने कानून में तय कठोर आयु सीमाओं के बजाय हर मामले का व्यक्तिगत मूल्यांकन करने की आवश्यकता पर एक नई बहस छेड़ दी है।
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