दिल्ली हाई कोर्ट ने ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ यानी ‘भूल जाने के अधिकार’ को निजता के अधिकार का महत्वपूर्ण हिस्सा माना है। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को इंटरनेट पर उपलब्ध पुरानी जानकारी के कारण अनिश्चितकाल तक प्रतिष्ठा की हानि नहीं झेलनी चाहिए। फैसले में व्यक्तिगत गरिमा और गोपनीयता की रक्षा पर जोर दिया गया। न्यायालय ने माना कि डिजिटल दुनिया में किसी मामले से जुड़ी जानकारी लंबे समय तक उपलब्ध रहने से व्यक्ति के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। अदालत ने कुछ परिस्थितियों में न्यायिक रिकॉर्ड में मौजूद निजी जानकारी को छिपाने की अनुमति दी है। इसके तहत पहचान उजागर करने वाली सूचनाओं को मास्क किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि जिन मामलों का निपटारा व्यक्ति के पक्ष में हो चुका है या जिनकी जानकारी निजी प्रकृति की है, उन्हें अनावश्यक रूप से सार्वजनिक नहीं रखा जाना चाहिए। सर्च इंजन कंपनियों को भी ऐसे रिकॉर्ड को खोज परिणामों से हटाने या कम प्रमुखता देने का निर्देश दिया जा सकता है। फैसले में निजता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखने की बात कही गई। अदालत ने माना कि तकनीक के दौर में व्यक्तिगत सम्मान की रक्षा आवश्यक है। यह निर्णय डिजिटल अधिकारों और डेटा गोपनीयता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे भविष्य में समान मामलों के लिए मार्गदर्शन मिलेगा। यह फैसला व्यक्तियों को अपनी डिजिटल पहचान पर अधिक नियंत्रण देने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
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