महासमुंद भारतीय लोकतंत्र के इतिहास के सबसे काले पन्ने यानी 25 जून 1975 के आपातकाल की 51वीं बरसी पर महासमुंद के स्वाध्याय केंद्र में संविधान हत्या दिवस के रूप में प्रबुद्ध जन सम्मेलन और विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में आपातकाल के क्रूर दौर में लोकतंत्र, संविधान और नागरिक अधिकारों पर हुए प्रहार को याद किया गया। साथ ही, देश में दोबारा लोकतांत्रिक व्यवस्था बहाल करने के लिए अपनी जान की बाजी लगाने वाले लोकतंत्र सेनानियों के संघर्ष को नमन करते हुए मीसाबंदी सेनानियों का सम्मान किया गया। विचार गोष्ठी में उस दौर के चश्मदीद गवाह और लोकतंत्र सेनानी मनीराम चंद्राकर ने जब अपने संघर्षपूर्ण जीवन की सच्ची घटनाओं को साझा किया, तो वहां मौजूद हर शख्स भावुक हो उठा। उन्होंने अपनी आपबीती बताते हुए कहा, विवाह के महज 16वें दिन ही मुझे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था। नवविवाहित जीवन की खुशियां अभी ठीक से शुरू भी नहीं हो पाई थीं कि लोकतंत्र की रक्षा के संघर्ष के कारण मुझे अपने परिवार से दूर होना पड़ा। जेल में रहते हुए छह महीने से अधिक समय तक कई प्रकार की मानसिक और शारीरिक यातनाएं झेलनी पड़ीं, लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रहित के प्रति मेरा संकल्प कभी कमजोर नहीं हुआ। सेनानी स्व अमृत साहू के संघर्षों को याद करते हुए उनकी धर्मपत्नी उर्मिला अमृत साहू ने भी उस दौर के अपने दर्दनाक अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि अमृत साहू जी मीसाबंदी रहे और उनके पूरे परिवार को अनेक कठिन और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। केवल जेल जाने वाले ही नहीं, उनके पीछे हजारों परिवारों ने भी भारी कठिनाइयों का सामना करते हुए लोकतंत्र की पुनर्स्थापना की। मुख्य वक्ता भाजपा प्रदेश मंत्री अमित साहू ने तत्कालीन सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि 25 जून 1975 को देश पर थोपा गया आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे कलंकित और काला अध्याय था। सिर्फ अपनी सत्ता बचाने के लिए संविधान की मूल भावना को बेरहमी से कुचलने का प्रयास किया गया। प्रेस की स्वतंत्रता पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिए गए। हजारों निर्दोष राजनीतिक कार्यकर्ताओं, सजग पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेल की काल कोठरियों में डाल दिया गया। आपातकाल की चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों से भी निकले हर वर्ष अपनी प्रतिबद्धता दोहराने का है ये अवसर भाजपा जिलाध्यक्ष येतराम साहू ने कहा कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा लगाए गए आपातकाल ने नागरिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों को गंभीर रूप से लहूलुहान कर दिया था। संविधान हत्या दिवस केवल इतिहास के पन्नों को पलटने या उसे स्मरण करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह हमारे भीतर लोकतंत्र की रक्षा के प्रति अपनी अटूट प्रतिबद्धता को बार-बार दोहराने का दिन है। नई पीढ़ी को उस दौर के सच से अवगत कराना आज के समय की सबसे बड़ी मांग है। सत्ता बचाने कुचली गई संविधान की मूल भावना
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