छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के क्रियान्वयन को लेकर एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि आरटीआई आवेदनों के निस्तारण में देरी होने पर लोक सूचना अधिकारियों पर जुर्माना लगाना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान जोर देकर कहा कि इस कानून का प्राथमिक उद्देश्य आवेदक को मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराना है, न कि केवल अधिकारियों को दंडित करना। महासमुंद जिले से संबंधित एक मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी सामने आई, जिसमें याचिकाकर्ता ने देरी के कारण अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई की मांग की थी। हाई कोर्ट का यह रुख प्रशासनिक अधिकारियों को राहत देने वाला है, जो प्रक्रियात्मक कारणों से होने वाली छोटी-मोटी देरी के चलते जुर्माने का सामना करते हैं। अदालत ने कहा कि जुर्माने का प्रावधान तब प्रभावी होना चाहिए जब अधिकारी दुर्भावनापूर्ण तरीके से जानकारी छिपाएं या टालमटोल करें। हालांकि, अदालती व्यवस्था के बाद भी अधिकारियों को समय सीमा के भीतर सूचना देने की जिम्मेदारी बनी रहेगी। इस निर्णय से आरटीआई कानून के व्यावहारिक अनुप्रयोग को नई दिशा मिलने की उम्मीद है। अब प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि जानकारी देने में देरी न हो, ताकि आवेदक को बार-बार कोर्ट की शरण न लेनी पड़े।
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