छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जांच और साक्ष्यों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि ऐसे संवेदनशील इलाकों में हर कार्रवाई के लिए स्वतंत्र गवाह मिलना हमेशा संभव नहीं होता। कोर्ट के अनुसार यदि पुलिस अधिकारियों की गवाही विश्वसनीय और सुसंगत हो, तो उसी के आधार पर भी आरोपी को दोषी ठहराया जा सकता है। केवल पुलिसकर्मी होने के कारण किसी गवाह के बयान को खारिज नहीं किया जा सकता। यह टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने प्रतिबंधित माओवादी संगठन से जुड़े एक आरोपी की अपील खारिज कर दी। अदालत ने NIA की विशेष अदालत द्वारा सुनाई गई 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा को बरकरार रखा। मामला वर्ष 2023 में बीजापुर जिले में विस्फोटक सामग्री बरामद होने से जुड़ा था। बचाव पक्ष ने स्वतंत्र गवाह के मुकर जाने और पुलिस गवाही पर निर्भरता का हवाला देकर राहत मांगी थी। हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी के कब्जे से बरामद इलेक्ट्रिक डेटोनेटर और अन्य साक्ष्यों का संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया। अदालत ने माना कि पुलिस गवाहों के बयानों में कोई महत्वपूर्ण विरोधाभास नहीं था। फैसले में कहा गया कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की परिस्थितियों को देखते हुए व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।
Source: Source