सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया तुषार मेहता की नई पुस्तक ‘The Bench, the Bar, and the Bizarre’ में न्यायिक प्रक्रियाओं में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग को लेकर चिंता जताई गई है। पुस्तक के एक अंश में यह सवाल उठाया गया है कि क्या ChatGPT जैसे AI टूल अदालतों में कानून के ‘सामान्य अर्थ’ की व्याख्या करने में सक्षम हो सकते हैं। हाल ही में जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट द्वारा फर्जी और अप्रमाणित कानूनी उद्धरणों पर रोक लगाने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए जाने के बाद यह चर्चा और तेज हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि AI आधारित टूल्स जानकारी प्रदान कर सकते हैं, लेकिन न्यायिक निर्णयों की जिम्मेदारी पूरी तरह मानव न्यायाधीशों पर ही रहनी चाहिए। लेख में यह भी संकेत दिया गया है कि तकनीक का बढ़ता उपयोग कानूनी प्रणाली में पारदर्शिता और विश्वसनीयता से जुड़े नए सवाल खड़े कर रहा है। न्यायपालिका में AI के उपयोग को लेकर सावधानी बरतने की जरूरत पर जोर दिया गया है। यह बहस इस बात पर केंद्रित है कि तकनीक सहायता कर सकती है, लेकिन अंतिम व्याख्या और निर्णय मानव विवेक पर आधारित होना चाहिए। डिजिटल युग में अदालतों के सामने सत्यापन योग्य स्रोतों की चुनौती भी बढ़ रही है। गलत या अप्रमाणित जानकारी न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है। इसी कारण कई अदालतें AI-जनित सामग्री को लेकर सतर्क रुख अपना रही हैं। यह विषय तकनीक और कानून के संतुलन पर व्यापक चर्चा को जन्म दे रहा है।
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