कर्नाटक हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण में बढ़ोतरी से जुड़े 2022 के कानून को लेकर अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने कानून की धारा 3 को असंवैधानिक ठहराते हुए रद्द कर दिया। कोर्ट के अनुसार, यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन करता है। अदालत ने आरक्षण की कुल सीमा 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होने की बात कही। 2022 में कानून के जरिए राज्य में एससी और एसटी समुदायों के लिए आरक्षण बढ़ाने का प्रावधान किया गया था। इसके परिणामस्वरूप राज्य में कुल आरक्षण 56 प्रतिशत तक पहुंच गया था। इस बढ़ोतरी के पीछे संबंधित समुदायों को अधिक प्रतिनिधित्व देने का तर्क दिया गया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने आरक्षण की संवैधानिक सीमाओं और समानता के अधिकार के आधार पर कानून के प्रावधान की समीक्षा की। अदालत के फैसले से आरक्षण बढ़ाने वाले कानून की धारा 3 प्रभावी नहीं रहेगी। यह निर्णय राज्य की आरक्षण नीति और संबंधित समुदायों को मिलने वाले लाभों पर असर डाल सकता है। फैसले के बाद आरक्षण व्यवस्था में आगे क्या बदलाव होंगे, यह संबंधित प्रशासनिक और कानूनी कदमों पर निर्भर करेगा।
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