दिल्ली की ऐतिहासिक पहचान गोल मार्केट, जो 1921 में बनी थी, आज अपनी बदहाली के लिए चर्चा में है। इस इमारत को संग्रहालय में बदलने और इसके जीर्णोद्धार का काम पिछले 20 वर्षों से अधूरा पड़ा है। मूल रूप से इसे 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों से पहले तैयार करने की योजना थी। हालांकि, मुकदमेबाजी, बार-बार लागत में संशोधन और प्रोजेक्ट के स्वरूप में बदलाव के कारण यह काम लटक गया। हाल ही में काम ने कुछ गति पकड़ी है और अब तक लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा पूरा हो चुका है। इसके बावजूद, पूरा होने की समयसीमा कई बार बदली जा चुकी है, जिससे स्थानीय व्यापारी भारी संकट में हैं। यह मार्केट आज अपनी पुरानी विरासत और अनिश्चित भविष्य के बीच फंसकर रह गया है। इस देरी ने न केवल इसकी संरचना को प्रभावित किया है, बल्कि इसकी सांस्कृतिक महत्ता पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है। प्रशासन अब इसे जल्द पूरा करने का दावा कर रहा है। दशकों से चला आ रहा यह इंतजार दिल्ली के सबसे पुराने बाजारों में से एक की कहानी बयां करता है।
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