केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि निर्वाचित प्रतिनिधि शपथ लेते समय संवैधानिक प्रावधानों से इतर कोई अन्य शब्द नहीं जोड़ सकते। अदालत ने व्यवस्था दी है कि विधायक या अन्य प्रतिनिधि संविधान द्वारा निर्धारित शपथ के प्रारूप में देवी-देवताओं, भारत माता या किसी अन्य नाम का उल्लेख नहीं कर सकते। कुछ जनप्रतिनिधियों द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन न करने पर कोर्ट ने उनकी शपथ को अवैध करार दिया है। अदालत ने इन प्रतिनिधियों को संविधान में तय नियमों के अनुसार दोबारा शपथ लेने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने बल दिया कि शपथ पूरी तरह से कानून और संविधान के दायरे में होनी चाहिए। इस फैसले से साफ हो गया है कि राजनीतिक या व्यक्तिगत आस्था के नाम पर शपथ के मूल स्वरूप से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय संवैधानिक मर्यादा को बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है। अदालती निर्देशों के बाद संबंधित प्रतिनिधियों को अब प्रक्रिया का सख्ती से पालन करना होगा। यह आदेश चुनावी शपथ ग्रहण समारोहों में एकरूपता और अनुशासन लाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। मामले की गंभीरता को देखते हुए भविष्य के लिए भी यह एक मिसाल बन गया है।
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