बॉम्बे हाईकोर्ट ने कम उपस्थिति के कारण परीक्षा से वंचित की गई मनोविज्ञान की एक छात्रा की याचिका खारिज कर दी। छात्रा ने मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का हवाला देते हुए परीक्षा में बैठने की अनुमति मांगी थी। अदालत ने उसकी परिस्थितियों के प्रति संवेदना व्यक्त की। हालांकि न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया कि सहानुभूति विश्वविद्यालय के नियमों का स्थान नहीं ले सकती। कोर्ट ने कहा कि उसका दायित्व कानून और नियमों का पालन सुनिश्चित करना है। न्यायालय ने कहा कि वह शैक्षणिक नियमों को बदल या पुनर्लेखित नहीं कर सकता। मामले की समीक्षा के बाद अदालत को डिबार करने के आदेश को रद्द करने का कोई असाधारण आधार नहीं मिला। कोर्ट ने माना कि उपस्थिति संबंधी नियम सभी छात्रों पर समान रूप से लागू किए गए हैं। छात्रा के मामले में किसी प्रकार के भेदभाव के प्रमाण नहीं मिले। न्यायाधीशों ने कहा कि व्यक्तिगत कठिनाइयों के बावजूद निर्धारित शैक्षणिक मानकों का पालन आवश्यक है। अदालत ने विश्वविद्यालय के निर्णय को वैध और नियमसम्मत माना। इस कारण छात्रा को परीक्षा में शामिल होने की अनुमति नहीं दी गई। फैसले में नियमों की समान और निष्पक्ष अनुपालना के महत्व पर जोर दिया गया। अदालत ने कहा कि भावनात्मक आधार पर कानूनी प्रावधानों को दरकिनार नहीं किया जा सकता।
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