इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि अदालतें अभियोजन पक्ष की ओर से भेजे गए हर आरोप को बिना जांच स्वीकार करने वाली ‘डाकघर’ की तरह काम नहीं कर सकतीं। अदालत ने कहा कि यदि किसी आरोपी का नाम बाद में बिना पर्याप्त आधार के जोड़ा गया हो, तो उसे आरोपमुक्त होने का अधिकार मिल सकता है। मामला एक मकान के कब्जे से जुड़े विवाद से संबंधित था, जो पहले से ही दीवानी अदालत में लंबित था। संबंधित दीवानी अदालत ने पक्षकारों को यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश भी दिया था। इसके बावजूद विवाद को लेकर आपराधिक कार्यवाही शुरू की गई। मामला दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) के तहत दायर आवेदन से उत्पन्न हुआ था। सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड और उपलब्ध तथ्यों का परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि कुछ महिलाओं के नाम बाद के चरण में मामले में जोड़े गए थे। न्यायालय ने कहा कि अभियोजन की कहानी और उपलब्ध साक्ष्यों का स्वतंत्र मूल्यांकन आवश्यक है। केवल आरोप लगाए जाने से किसी व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा जारी नहीं रखा जा सकता। अदालत ने निष्पक्ष न्यायिक जांच और पर्याप्त आधार की आवश्यकता पर जोर दिया। यह फैसला आपराधिक मामलों में आरोप तय करने और आरोपमुक्ति से जुड़े कानूनी सिद्धांतों को स्पष्ट करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।
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