भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने रुपये को मजबूती देने और बाहरी आर्थिक चुनौतियों से निपटने के लिए हाल में कई महत्वपूर्ण मौद्रिक नीतिगत कदम उठाए हैं। विश्लेषकों का मानना है कि इन उपायों से देश में 40 से 75 अरब डॉलर तक की नई पूंजी का प्रवाह हो सकता है। विदेशी निवेश बढ़ने से रुपये को समर्थन मिलने और उसकी कमजोरी पर अंकुश लगने की संभावना जताई जा रही है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और डॉलर की मजबूती के बीच भारतीय मुद्रा पर दबाव बना हुआ है। ऐसे में आरबीआई का फोकस वित्तीय स्थिरता बनाए रखने पर है। बढ़ती महंगाई की चुनौतियों के बावजूद केंद्रीय बैंक संतुलित नीति अपनाने की कोशिश कर रहा है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगस्त में होने वाली मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक में रेपो दर 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखी जा सकती है। इसके साथ ही नीति रुख को तटस्थ बनाए रखने की संभावना है। आरबीआई फिलहाल आर्थिक वृद्धि और मुद्रास्फीति के बीच संतुलन साधने पर ध्यान दे रहा है। बाहरी क्षेत्र को मजबूत रखना भी उसकी प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है। पूंजी प्रवाह बढ़ने से विदेशी मुद्रा भंडार को अतिरिक्त सहारा मिल सकता है। इससे रुपये में स्थिरता आने और बाजार का भरोसा मजबूत होने की उम्मीद है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में आरबीआई के कदम भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक दबावों से बचाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
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