साल 1828 में जर्मन रसायनशास्त्री फ्रेडरिक वोहलर ने एक ऐसा प्रयोग किया जिसने विज्ञान की स्थापित मान्यताओं को चुनौती दे दी। उस समय वैज्ञानिकों का मानना था कि जीवित प्राणियों में पाए जाने वाले कार्बनिक पदार्थ केवल जीवित शरीरों में ही बन सकते हैं। इस विचार को ‘वाइटल फोर्स’ या जीवन शक्ति सिद्धांत कहा जाता था। वोहलर ने अकार्बनिक यौगिकों का उपयोग करके यूरिया का सफल संश्लेषण किया। यूरिया एक ऐसा पदार्थ है जो सामान्यतः जीवित जीवों के चयापचय से जुड़ा माना जाता था। इस उपलब्धि ने साबित किया कि कार्बनिक अणुओं का निर्माण प्रयोगशाला में भी संभव है। उनके प्रयोग ने जीवन शक्ति सिद्धांत की नींव को हिला दिया। वैज्ञानिक समुदाय ने इसे रसायन विज्ञान के इतिहास में एक क्रांतिकारी घटना माना। इस खोज के बाद कार्बनिक रसायन विज्ञान के क्षेत्र में तेजी से विकास शुरू हुआ। शोधकर्ताओं को यह समझने का नया मार्ग मिला कि जीवन से जुड़े रासायनिक यौगिक कैसे बनते हैं। वोहलर का प्रयोग आधुनिक जैव रसायन और कार्बनिक रसायन विज्ञान की दिशा तय करने वाले महत्वपूर्ण पड़ावों में गिना जाता है। इसने यह धारणा बदल दी कि जीवन से जुड़े पदार्थों के निर्माण के लिए किसी रहस्यमयी शक्ति की आवश्यकता होती है। आज भी इस खोज को विज्ञान के इतिहास की सबसे प्रभावशाली उपलब्धियों में से एक माना जाता है।
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