त्याग, इंसानियत और अल्लाह के प्रति अटूट आस्था का संदेश देता ईद-उल-अजहा यानी बकरीद का त्योहार वीरवार को मनाया जाएगा। इसको लेकर शहर के पुराने मोहल्ले सज चुके हैं। वीरवार को बकरीद की शुरुआत विशेष नमाज से होगी। इसके बाद लोग अल्लाह की राह में कुर्बानी देते हैं और जरूरतमंदों की मदद कर भाईचारे और मानवता का संदेश फैलाते हैं। सामाजिक समानता और बांटने की खुशी कुर्बानी के साथ सामाजिक संदेश जुड़ा है। पारंपरिक रूप से भी कुर्बानी के तीन हिस्से किए जाते हैं। पहला हिस्सा- गरीबों और जरूरतमंदों के लिए, दूसरा हिस्सा- रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए और तीसरा हिस्सा- अपने परिवार के लिए। यह सिखाता है कि आपके पास जो कुछ भी है, उस पर सिर्फ आपका हक नहीं है, बल्कि समाज के पिछड़े और कमजोर वर्ग का भी उसमें हिस्सा है। -हाजी आबिद हसन सलमानी, पंजाब प्रधान ऑल इंडिया जमात ए सलमानी असली कुर्बानी सिर्फ बकरे या जानवर की नहीं, बल्कि जरूरतमंद लोगों की सहायता करना भी है। अगर कोई व्यक्ति गरीबों, बेसहारा लोगों और जरूरतमंद परिवारों की मदद करता है तो वह भी एक बड़ी इबादत और कुर्बानी के बराबर है। त्योहार की खुशियों में गरीबों और जरूरतमंदों को भी शामिल किया जाए ताकि हर चेहरे पर मुस्कान लाई जा सके। -मौलाना शमशाद, इमाम नासिर मस्जिद . ईदगाह मस्जिद सुबह 7 बजे . ईदगाह कैंट सुबह 7:30 बजे .मस्जिद नूरपुर सुबह 8 बजे . मस्जिद फातिमा सुबह 7 बजे . मस्जिद बिलाल सुबह 7:30 बजे . मस्जिद बूटा मंडी सुबह 7 बजे . मस्जिद उमर दानिशमंदा सुबह 7:30 बजे . मस्जिद स्टेट सुबह 7:30 बजे . मस्जिद जनता कॉलोनी सुबह 8:30 बजे . मस्जिद कंगनीवाल सुबह 7:40 बजे . मस्जिद कबूलपुर सुबह 8:00 बजे . मस्जिद फिरदौस कचहरी वाली सुबह 8:00 बजे . मस्जिद सब्जी मंडी सुबह 7:30 बजे . मस्जिद आलीशान सुबह 7:30 बजे। भीतर के अहंकार की बलि देना है कुर्बानी असल कुर्बानी किसी जीव को काटने से ज्यादा, अपने भीतर की बुराइयों को खत्म करना है। अहंकार (घमंड), लालच, नफरत और जलन जैसी भावनाएं इंसान को अंदर से खोखला करती हैं। प्रतीकात्मक रूप से, कुर्बानी का मतलब है अपनी पसंदीदा या प्यारी चीज का त्याग करना। आज के समय में मनुष्य को अपनी ईगो (अहंकार) सबसे प्यारी होती है। उसे छोड़ना ही सबसे बड़ी कुर्बानी है। -एडवोकेट नईम खान, मुस्लिम संगठन पंजाब
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