साल 1991 में भारत गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा था। देश का विदेशी मुद्रा भंडार इतना कम हो गया था कि केवल दो हफ्तों के आयात का खर्च ही पूरा हो सकता था। कच्चे तेल और जरूरी वस्तुओं की खरीद के लिए धन की कमी बढ़ती जा रही थी। इस स्थिति ने सरकार के सामने बड़ी आर्थिक चुनौती खड़ी कर दी थी। विदेशी भुगतान संकट से निपटने के लिए कई अहम फैसले लिए गए। इसी दौर में भारत की आर्थिक नीतियों में बड़े बदलाव की शुरुआत हुई। इन फैसलों ने देश की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियों की नींव इसी संकट के बाद मजबूत हुई। 1991 का आर्थिक सुधार भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। इस बदलाव ने आने वाले वर्षों में देश के आर्थिक विकास का रास्ता तैयार किया।
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