उत्तराखंड की ऊंची हिमालयी चोटियों के बीच स्थित श्री हेमकुंड साहिब आज सिख समुदाय के सबसे पवित्र तीर्थस्थलों में गिना जाता है। समुद्र तल से लगभग 15,200 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस स्थल तक हर साल हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। लेकिन एक समय ऐसा था जब इसका उल्लेख धार्मिक ग्रंथों में तो मिलता था, पर इसकी वास्तविक लोकेशन अज्ञात थी। गुरु गोबिंद सिंह की रचना ‘बचित्र नाटक’ में सात पर्वत चोटियों और एक बर्फानी कुंड से घिरे तपस्थल का वर्णन मिलता है। इसी वर्णन ने पीढ़ियों तक लोगों को उस स्थान की खोज के लिए प्रेरित किया। वर्ष 1884 में पंडित तारा सिंह नरोत्तम ने लोकपाल झील को इस वर्णन से जोड़ने का प्रयास किया था। बाद में सिख विद्वान भाई वीर सिंह की पुस्तक ने इस खोज को नई दिशा दी। इससे प्रेरित होकर संत सोहन सिंह ने हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों में खोज अभियान शुरू किया। वर्ष 1934 में उन्होंने लोकपाल झील तक पहुंचकर इसे गुरु गोबिंद सिंह के तपस्थल के रूप में पहचाना। इसके बाद श्रद्धालुओं के लिए यहां धार्मिक संरचना बनाने का कार्य शुरू हुआ। वर्ष 1936 में झील के किनारे पहला छोटा गुरुद्वारा बनाया गया। अगले वर्ष पहली बार श्री गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाश किया गया और संगठित तीर्थयात्रा की शुरुआत हुई। आज भी हेमकुंड साहिब तक पहुंचना कठिन माना जाता है, लेकिन श्रद्धालुओं का उत्साह लगातार बढ़ रहा है। यह स्थल आस्था, समर्पण और एक सदी लंबी खोज की अद्भुत कहानी का प्रतीक बन चुका है।
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