सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी भी कर्मचारी को सेवा से बर्खास्त करने का कठोर दंड केवल गंभीर अपराधों के मामले में ही दिया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. के. सिंह की पीठ ने स्पष्ट किया कि कार्यस्थल पर अनुशासन का महत्व सर्वोपरि है, लेकिन छोटी गलतियों के लिए नौकरी छीनना उचित नहीं है। अदालत ने कहा कि भ्रष्टाचार, अवैध रिश्वतखोरी, नैतिक अधमता, धन का गबन, नियोक्ता को नुकसान पहुंचाना, सार्वजनिक कलंक या संगठन की प्रतिष्ठा को धूमिल करने जैसे गंभीर मामलों के अभाव में बर्खास्तगी की सजा नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुशासनहीनता के मामलों में सजा अनुपातहीन नहीं होनी चाहिए। यह फैसला उन कर्मचारियों के लिए एक बड़ी राहत है जिन्हें छोटी प्रशासनिक त्रुटियों के कारण नौकरी से निकाल दिया जाता था। न्यायाधीशों ने जोर देकर कहा कि रोजगार से वंचित करना एक कठोर कदम है जो कर्मचारी के जीवन पर गहरा प्रभाव डालता है। इसलिए, ऐसी कार्रवाई से पहले कदाचार की गंभीरता को मापना आवश्यक है। यह निर्णय देशभर में विभागीय कार्रवाई और श्रम कानूनों के मामलों में एक नजीर साबित होगा। अदालत ने अधिकारियों को अनुशासनात्मक कार्रवाई के दौरान अधिक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दी है।
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