भारत के शहरी क्षेत्रों में किफायती आवास की समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार वर्ष 2030 तक शहरी आवास की कमी 3 करोड़ इकाइयों तक पहुंच सकती है। बढ़ती जमीन की कीमतों और निर्माण लागत ने किफायती घरों का निर्माण कठिन बना दिया है। कई रियल एस्टेट डेवलपर्स अब सस्ते आवास परियोजनाओं से दूरी बना रहे हैं। इसके पीछे सीमित लाभ और वित्तीय व्यवहार्यता की चुनौतियां प्रमुख कारण हैं। दूसरी ओर, कई शहरों में किफायती घरों की वास्तविक कीमत 45 लाख रुपये से अधिक हो चुकी है। इसके बावजूद सरकार द्वारा किफायती आवास की परिभाषा और मूल्य सीमा में अपेक्षित बदलाव नहीं किया गया है। उद्योग जगत का मानना है कि मौजूदा सीमा बाजार की वास्तविकताओं से मेल नहीं खाती। नए किफायती आवास प्रोजेक्ट्स की लॉन्चिंग में भी उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। इससे मध्यम और निम्न आय वर्ग के लोगों के लिए घर खरीदना और कठिन होता जा रहा है। आवास क्षेत्र के विशेषज्ञ नीति स्तर पर सुधार और नई प्रोत्साहन योजनाओं की मांग कर रहे हैं। उनका मानना है कि मांग और आपूर्ति के बीच बढ़ती खाई को पाटने के लिए त्वरित कदम जरूरी हैं। यदि समय रहते समाधान नहीं निकाला गया तो आने वाले वर्षों में शहरी आवास संकट और गहरा सकता है।
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