मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब दुनिया भर के उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ने लगा है। वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से वृद्धि होने के कारण कई देशों में महंगाई का दबाव बढ़ रहा है। भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर इसका प्रभाव और अधिक दिखाई दे रहा है। कच्चे तेल के महंगा होने से ईंधन की लागत बढ़ रही है। इसके साथ ही रुपये की कमजोरी आयातित वस्तुओं को और महंगा बना रही है। परिवहन और लॉजिस्टिक्स खर्च बढ़ने से रोजमर्रा की जरूरत की वस्तुओं की कीमतों पर असर पड़ रहा है। खाद्य तेल, दूध, ब्रेड और अन्य उपभोक्ता उत्पादों की लागत में वृद्धि देखी जा रही है। उत्पादन और वितरण खर्च बढ़ने के कारण कंपनियां कीमतों में बढ़ोतरी कर सकती हैं। महंगाई का यह प्रभाव केवल खाद्य पदार्थों तक सीमित नहीं है। स्वास्थ्य सेवाओं और दवाओं की लागत पर भी दबाव बढ़ने की आशंका है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर पूरी अर्थव्यवस्था में दिखाई देता है। यदि मध्य पूर्व में तनाव लंबे समय तक बना रहता है तो महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है। ऐसे हालात में घरेलू बजट पर अतिरिक्त बोझ पड़ने की संभावना है और उपभोक्ताओं को अपनी खर्च योजना में बदलाव करना पड़ सकता है।
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