भारत में पहली बार जन्मदर रिप्लेसमेंट स्तर से नीचे पहुंच गई है, जो देश की जनसांख्यिकीय संरचना में बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है। इस विषय पर एलन मस्क ने बढ़ती शिक्षा, विशेषकर महिलाओं की शिक्षा, को प्रमुख कारणों में से एक बताया है। विशेषज्ञों का मानना है कि 1990 के दशक के बाद शिक्षा और आर्थिक विकास में हुए सुधारों ने परिवार नियोजन की सोच को प्रभावित किया है। अब परिवार अधिक बच्चों की बजाय कम बच्चों के बेहतर भविष्य पर ध्यान दे रहे हैं। माता-पिता शिक्षा, स्वास्थ्य और अवसरों पर अधिक निवेश करने को प्राथमिकता दे रहे हैं। इस बदलाव ने परिवारों के आकार को धीरे-धीरे छोटा किया है। महिला शिक्षा में वृद्धि के साथ विवाह और मातृत्व की औसत आयु में भी बदलाव देखा गया है। आर्थिक प्रगति और शहरीकरण ने भी जन्मदर को प्रभावित किया है। यह प्रवृत्ति केवल विकसित राज्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि अपेक्षाकृत गरीब राज्यों में भी दिखाई दे रही है। विशेषज्ञ इसे सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण संकेत मानते हैं। जन्मदर में गिरावट का असर भविष्य में श्रमबल, वृद्ध आबादी और आर्थिक नीतियों पर पड़ सकता है। सरकारों और नीति निर्माताओं को बदलती जनसंख्या संरचना के अनुरूप नई रणनीतियां बनानी पड़ सकती हैं। एलन मस्क लंबे समय से वैश्विक स्तर पर घटती जन्मदर को लेकर चिंता व्यक्त करते रहे हैं। भारत का यह नया जनसांख्यिकीय बदलाव भी इसी व्यापक वैश्विक चर्चा का हिस्सा बन गया है।
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