सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों की अभिरक्षा (कस्टडी) से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि ऐसे विवादों में माता-पिता की मनोवैज्ञानिक और मानसिक स्थिति का मूल्यांकन अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह ने फैसले में कहा कि बच्चे की आवश्यकताओं को समझने और पूरा करने की क्षमता का आकलन करना जरूरी है। अदालत के अनुसार केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि बच्चा किस अभिभावक के साथ सहज महसूस करेगा। माता-पिता की मानसिक और भावनात्मक स्थिति का परीक्षण भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चे के मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन से पहले माता-पिता की जांच की जानी चाहिए। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि बच्चा किस अभिभावक के साथ बेहतर तालमेल और विकास कर सकता है। अदालत ने बच्चे के सर्वोत्तम हित को ऐसे मामलों का प्रमुख आधार बताया। फैसले का उद्देश्य कस्टडी मामलों में अधिक वैज्ञानिक और संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना है। विशेषज्ञों की राय और मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन को अब अधिक महत्व मिलने की संभावना है। यह निर्णय पारिवारिक न्यायालयों के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चे के समग्र विकास और कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
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