शिक्षा के पारंपरिक तरीकों को चुनौती देती हुई एक नई सोच सामने आई है कि कई बार सवाल पूछना जवाब देने से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। यह दृष्टिकोण रटने-पढ़ने की बजाय जिज्ञासा और आलोचनात्मक चिंतन पर जोर देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि सही सवाल पूछने से नई खोजों के द्वार खुलते हैं। यह ‘नया व्याकरण’ बच्चों को परीक्षा के लिए नहीं बल्कि जीवन के लिए सीखने की प्रेरणा देता है। कक्षाओं में खुले प्रश्नों पर बातचीत को बढ़ावा देना चाहिए। इस पद्धति से छात्रों में समस्या समाधान और नवाचार के कौशल विकसित होते हैं। शोध बताते हैं कि जो बच्चे अधिक सवाल पूछते हैं, वे लंबे समय में अधिक सफल होते हैं। शिक्षकों को अब ‘सही उत्तर देने वाला’ नहीं बल्कि ‘सही प्रश्न पूछने वाला’ बनना होगा। यह बदलाव शिक्षा जगत में क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है।
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