सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय में गृहणियों के योगदान को राष्ट्र निर्माण के लिए अपरिहार्य माना है। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. के. सिंह की पीठ ने कहा कि महिलाएं ‘मानव पूंजी’ तैयार करने के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं, जिस पर देश की एक बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का सपना टिका है। अदालत ने दुर्घटना मुआवजा दावों के निपटारे के लिए गृहिणी की काल्पनिक आय को 30,000 रुपये प्रति माह निर्धारित किया है। पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि मुआवजे का भुगतान तीन महीने के भीतर नहीं किया जाता है, तो ब्याज दर बढ़कर 9% हो जाएगी। छह महीने की देरी होने पर यह ब्याज दर 12% प्रति वर्ष तक बढ़ जाएगी। यह आदेश उन परिवारों के लिए बड़ी राहत है जो घर की महिला के किसी दुर्घटना का शिकार होने पर उचित मुआवजे से वंचित रह जाते थे। न्यायालय ने ऐसे 123 मामलों की सूची भी जारी की है जिनका निपटारा न्यायमूर्ति करोल के नेतृत्व वाली पीठ ने किया है। यह फैसला महिलाओं के घरेलू कार्यों को आर्थिक मूल्य देने की दिशा में एक बड़ा कदम है। कानून के जानकारों का मानना है कि इससे भविष्य में मुआवजा तय करने के तरीके में बड़ा बदलाव आएगा।
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