शहरों में खाली पड़े प्लॉट और आम क्षेत्रों को अब हरे-भरे कम्युनिटी गार्डन में बदला जा रहा है। इस पहल के पीछे रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWAs), गैर सरकारी संगठन (NGOs) और स्कूलों की सक्रिय भूमिका है। इन जगहों पर अब स्थानीय लोग मिलकर सब्जियां और पौधे उगा रहे हैं। इससे न केवल पर्यावरण को फायदा हो रहा है, बल्कि समुदाय में जुड़ाव भी बढ़ रहा है। स्कूलों के छात्र भी इस अभियान में हिस्सा लेकर खेती और प्रकृति के बारे में सीख रहे हैं। कई जगहों पर यह पहल शहरी खेती (अर्बन फार्मिंग) के रूप में विकसित हो रही है। इससे खाली जमीन का बेहतर उपयोग संभव हो पा रहा है। लोगों को ताजी सब्जियां भी स्थानीय स्तर पर उपलब्ध हो रही हैं। यह पहल पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास को बढ़ावा दे रही है। साथ ही यह बच्चों और युवाओं में पर्यावरण के प्रति जागरूकता भी बढ़ा रही है। समुदाय के लोग मिलकर इन गार्डनों की देखरेख कर रहे हैं। इससे सामाजिक एकता और सहयोग की भावना मजबूत हो रही है। विशेषज्ञों के अनुसार यह मॉडल भविष्य के शहरी विकास के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकता है। कई शहरों में इसे विस्तार देने की योजना भी बनाई जा रही है।
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