अमेरिकी नौसेना अपने विमानवाहक पोतों के संचालन में मानवरहित टैंकर ड्रोन को शामिल कर रही है। इस कदम का उद्देश्य कैरियर स्ट्राइक समूहों की परिचालन क्षमता बढ़ाना है। ड्रोन के इस्तेमाल से नौसैनिक अभियानों की पहुंच और टिकाऊपन में वृद्धि हो सकती है। मानवरहित टैंकर विमान युद्धक विमानों की हवा में ईंधन भरने की क्षमता को बढ़ा सकते हैं। इससे विमानवाहक पोतों से संचालित विमानों की मिशन रेंज बढ़ने की उम्मीद है। ड्रोन नौसैनिक समूहों के लिए सेंसर की पहुंच भी विस्तारित कर सकते हैं। इनके जरिए सीमित स्ट्राइक क्षमताएं भी उपलब्ध कराई जा सकती हैं। भारत भी मानवरहित कैरियर एविएशन क्षमता विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। दोनों देश भविष्य के समुद्री युद्ध में ड्रोन और अन्य मानवरहित प्लेटफॉर्म की भूमिका बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं। मानवरहित प्रणालियां मानवयुक्त विमानों के साथ मिलकर काम कर सकती हैं। इससे नौसैनिक अभियानों में जोखिम कम करने और ऑपरेशनल लचीलापन बढ़ाने में मदद मिल सकती है। अमेरिका और भारत की ये पहल समुद्री सुरक्षा के बदलते स्वरूप को दर्शाती हैं। भविष्य के युद्ध में लंबी दूरी की निगरानी और मानवरहित तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। दोनों देशों की रणनीतियां विमानवाहक पोतों को नई मानवरहित क्षमताओं से लैस करने की दिशा में बढ़ रही हैं।
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