साल 1972 में एक करोड़पति ने प्रशांत महासागर में कृत्रिम द्वीप बनाने की महत्वाकांक्षी योजना शुरू की। उसका उद्देश्य इस द्वीप को एक स्वतंत्र और टैक्स-फ्री देश के रूप में स्थापित करना था। इस परियोजना ने उस समय काफी ध्यान आकर्षित किया। कृत्रिम द्वीप को भविष्य के नए राष्ट्र की नींव माना जा रहा था। इसके पीछे आर्थिक स्वतंत्रता और कर-मुक्त व्यवस्था की अवधारणा थी। हालांकि यह सपना लंबे समय तक टिक नहीं सका। राष्ट्र के रूप में मान्यता मिलने से पहले ही यह कृत्रिम द्वीप अस्तित्व खो बैठा। प्राकृतिक परिस्थितियों और अन्य चुनौतियों ने परियोजना को प्रभावित किया। परिणामस्वरूप यह महत्वाकांक्षी प्रयास सफल नहीं हो पाया। यह घटना आज भी असफल माइक्रोनेशन परियोजनाओं के उल्लेखनीय उदाहरणों में गिनी जाती है。
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