मानसून की बारिश किसानों के लिए जहां नई उम्मीद लेकर आती है, वहीं इस बार कई इलाकों में नई समस्या भी सामने आई है। नदी-नालों और जल निकासी मार्गों से बहकर आया प्लास्टिक कचरा खेतों तक पहुंच गया है। इससे कृषि भूमि प्रदूषित हो रही है और पर्यावरण पर भी खतरा बढ़ रहा है। धान की बुवाई के समय किसान खेतों की तैयारी करने के बजाय प्लास्टिक कचरा हटाने में जुटे हुए हैं। खेतों में पॉलिथीन, गुटखा और तंबाकू के रैपर, बेकरी पैकेजिंग और सिंगल यूज प्लास्टिक बड़ी मात्रा में जमा हो गया है। इस कचरे के कारण मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, प्लास्टिक प्रदूषण का असर फसलों और मानव स्वास्थ्य दोनों पर पड़ सकता है। बारिश के पानी के साथ प्लास्टिक कचरा कृषि क्षेत्रों में फैल रहा है। किसानों को अतिरिक्त मेहनत और खर्च का सामना करना पड़ रहा है। पर्यावरण संरक्षण के लिए प्लास्टिक कचरे के उचित निपटारे की जरूरत बढ़ गई है। प्रशासन और स्थानीय स्तर पर प्लास्टिक नियंत्रण के लिए प्रभावी कदम उठाने की मांग की जा रही है।
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