भारत में तेजी से बढ़ रहे रूफटॉप सोलर सेक्टर में पश्चिम बंगाल काफी पीछे रह गया है। राज्य में केवल 67 मेगावाट क्षमता ही स्थापित हो पाई है, जबकि गुजरात जैसे राज्यों में यह आंकड़ा हजारों मेगावाट तक पहुंच चुका है। विशेषज्ञों के अनुसार इसकी वजह धूप की कमी नहीं बल्कि प्रशासनिक और ढांचागत समस्याएं हैं। डिस्कॉम से मंजूरी मिलने में देरी को एक बड़ी बाधा माना जा रहा है। स्थानीय स्तर पर बुनियादी ढांचे की कमजोर स्थिति भी एक प्रमुख कारण है। नीति क्रियान्वयन में धीमापन इस क्षेत्र के विकास को प्रभावित कर रहा है। सोलर परियोजनाओं को लागू करने में प्रक्रियागत जटिलताएं भी सामने आई हैं। इससे निवेशकों की रुचि प्रभावित हो रही है। विशेषज्ञ इसे आर्थिक अवसर के नुकसान के रूप में देख रहे हैं। साथ ही यह भारत के जलवायु लक्ष्यों को भी प्रभावित कर सकता है। केंद्र सरकार के सोलर विस्तार लक्ष्यों को हासिल करने में राज्यों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। पश्चिम बंगाल में सुधार के लिए बेहतर प्रशासनिक समन्वय की जरूरत बताई जा रही है। यदि प्रक्रियाएं सरल हों तो राज्य में सौर ऊर्जा की क्षमता तेजी से बढ़ सकती है।
Source: Source