तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों का ‘नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) में विलय अब एक बड़े कानूनी विवाद का विषय बन गया है। विश्लेषकों और संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि सांसदों द्वारा अपनाई गई विलय की प्रक्रिया में कई कानूनी खामियां हैं। जानकारों के अनुसार, यह कदम दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के कड़े प्रावधानों के सामने कमजोर साबित हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व में दिए गए ऐतिहासिक फैसलों और व्याख्याओं के आधार पर भी इस विलय की वैधता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लग रहे हैं। बागी सांसदों ने इसे एक सुरक्षित कदम बताया है, लेकिन कानूनी विशेषज्ञों की राय इसे सिरे से खारिज कर रही है। यह मामला अब संवैधानिक पेचीदगियों में फंसता हुआ नजर आ रहा है, जो भविष्य में इन सांसदों की सदस्यता के लिए खतरा पैदा कर सकता है। राजनीतिक गलियारों में इस ‘विलय’ को एक सोची-समझी साजिश या महज राजनीतिक मजाक के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि कानून के जानकारों की नजर में यह प्रक्रिया पूरी तरह से दोषपूर्ण है। यह घटनाक्रम दल-बदल कानून की प्रभावशीलता पर भी नए सिरे से बहस छेड़ रहा है।
Source: Source