विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार तुलना करने वाली सामाजिक संस्कृति युवाओं के आत्मविश्वास को प्रभावित कर रही है। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के बढ़ते प्रभाव के कारण कई युवा अपनी बात खुलकर रखने से हिचकिचाते हैं। उन्हें डर रहता है कि उनके शब्दों का गलत अर्थ निकाला जा सकता है या उनकी आलोचना हो सकती है। इस कारण वे अक्सर स्वयं ही अपनी अभिव्यक्ति को सीमित कर लेते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, युवा हर बात कहने से पहले यह सोचते हैं कि दूसरे लोग उसे कैसे देखेंगे। यह प्रवृत्ति उन्हें लगातार एक काल्पनिक दर्शक वर्ग के सामने होने का एहसास कराती है। परिणामस्वरूप, वे अपने विचार साझा करने में असहज महसूस करते हैं। इसका असर उनके सामाजिक विकास और संवाद कौशल पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अत्यधिक तुलना आत्म-संदेह को बढ़ावा देती है। आज की पीढ़ी पहले की तुलना में अधिक जुड़ी हुई दिखाई देती है, लेकिन वास्तविक रूप से खुद को व्यक्त करने में अधिक संकोच महसूस करती है। गलत समझे जाने या आलोचना का भय उन्हें खुलकर बोलने से रोकता है। इससे व्यक्तिगत और सामाजिक संबंधों पर भी प्रभाव पड़ सकता है। विशेषज्ञों ने युवाओं को आत्मविश्वास बढ़ाने और अपनी बात सम्मानपूर्वक रखने के लिए प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
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