तृणमूल कांग्रेस के कुछ सांसदों के एक गुट ने पार्टी से अलग होने का दावा किया है। इस गुट ने खुद को नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी में विलय करने की घोषणा की है। बागी सांसदों का कहना है कि वे संसद में अलग पहचान और मान्यता चाहते हैं। दूसरी ओर, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला तृणमूल कांग्रेस गुट इस दावे को पूरी तरह खारिज कर रहा है। पार्टी नेतृत्व का कहना है कि असली टीएमसी वही है और पार्टी की पहचान उसी के पास है। विवाद केवल संगठन तक सीमित नहीं है, बल्कि चुनाव चिह्न और राजनीतिक विरासत पर भी केंद्रित हो गया है। दोनों पक्ष खुद को वास्तविक उत्तराधिकारी साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में इस घटनाक्रम को महत्वपूर्ण शक्ति संघर्ष के रूप में देखा जा रहा है। संसद में मान्यता को लेकर भी कानूनी और प्रक्रियात्मक सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मामला आगे चलकर अदालत तक पहुंच सकता है। चुनाव आयोग की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है, यदि चुनाव चिह्न को लेकर औपचारिक विवाद पैदा होता है। इस घटनाक्रम से राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में नई हलचल पैदा हो गई है। आने वाले दिनों में दोनों पक्षों के बीच कानूनी और राजनीतिक लड़ाई और तेज होने की संभावना है।
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