महज 7,299 रुपये के यात्रा भत्ता (TA) बिल के भुगतान को लेकर शुरू हुआ एक कानूनी विवाद पूरे 19 साल तक अदालतों में चलता रहा। आखिरकार पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा सरकार की नियमित द्वितीय अपील को खारिज करते हुए इस मामले का अंत कर दिया है। हाई कोर्ट की जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने इस फैसले के साथ ही सरकारी विभागों की मुकदमेबाजी की प्रवृत्ति पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब मूल विवाद की राशि 25 हजार रुपये से कम हो, तो सीपीसी की धारा 102 के तहत अपील दायर ही नहीं हो सकती। ऐसे में कानूनी रूप से हरियाणा सरकार की यह अपील हाई कोर्ट में सुनवाई के योग्य ही नहीं थी। यह पूरा मामला रोहतक के एक सरकारी कर्मचारी ओपी खन्ना के लंबित टीए बिलों के भुगतान से जुड़ा हुआ है। विभाग ने बजट की कमी और कुछ तकनीकी आपत्तियों का हवाला देकर कर्मचारी के जायज पैसों का भुगतान रोक रखा था। इसके बाद पीड़ित कर्मचारी ने साल 2005-2006 के दौरान अपने हक के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। वर्ष 2007 में जिला जज ने कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाया था, जिसके खिलाफ हरियाणा सरकार हाई कोर्ट पहुंच गई थी। हाई कोर्ट ने चिंता जताई कि सरकारी विभाग कई बार विवादित राशि से कई गुना अधिक पैसा वकीलों और मुकदमेबाजी पर फूंक देते हैं। कोर्ट ने इसे सरकारी संसाधनों, जनता के टैक्स के पैसों और न्यायपालिका के कीमती समय का अनावश्यक दुरुपयोग माना है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, समय पर प्रशासनिक निर्णय न लेने की वजह से सरकारी खजाने और न्यायिक व्यवस्था दोनों पर बोझ बढ़ता है।
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