सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे दोषी को 11 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है, जिसे उसकी पैरोल अवधि समाप्त होने के 24 दिन बाद भी हिरासत में रखा गया था। अदालत ने इसे अवैध हिरासत करार दिया। यह मामला मौलिक अधिकारों के उल्लंघन से जुड़ा है। न्यायालय ने कहा कि पैरोल के बाद भी व्यक्ति को बिना कानूनी आधार पर रोकना अनुचित है। शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार की कार्रवाई को मनमाना ठहराया। दोषी ने याचिका में कहा कि उसे अवैध तरीके से उसकी स्वतंत्रता से वंचित किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी भी नागरिक को बिना वैध कारण के हिरासत में नहीं रखा जा सकता। मुआवजे की राशि उसकी मानसिक पीड़ा और आजीविका के नुकसान के लिए दी गई है। यह फैसला अवैध हिरासत के खिलाफ नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है। अदालत ने राज्य को निर्देश दिया कि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों। इस निर्णय से अन्य समान मामलों में भी राहत का मार्ग प्रशस्त होगा।
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