कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के आदिवासी समुदायों ने वन्यजीव पर्यटन और टाइगर रिजर्व विस्तार के खिलाफ आवाज उठाई है। उनका आरोप है कि उनकी पुश्तैनी जमीनों का व्यावसायीकरण किया जा रहा है। समुदायों का कहना है कि संरक्षण परियोजनाओं के नाम पर परिवारों को उनके घरों से हटाया जा रहा है। उन्होंने अधिकारियों और संरक्षण से जुड़ी संस्थाओं पर उनके अधिकारों की अनदेखी करने का आरोप लगाया है। आदिवासी संगठनों ने संयुक्त रूप से एक घोषणा जारी की है। इसमें सभी प्रकार के जबरन पुनर्वास और विस्थापन पर तत्काल रोक लगाने की मांग की गई है। उन्होंने कहा कि जंगलों और भूमि पर उनके पारंपरिक अधिकारों को कानूनी मान्यता मिलनी चाहिए। प्रदर्शनकारियों का मानना है कि संरक्षण की वर्तमान नीतियां स्थानीय समुदायों को हाशिए पर धकेल रही हैं। उनका कहना है कि सदियों से वे इन जंगलों के संरक्षक रहे हैं। आदिवासियों ने जबरन संरक्षण की प्रक्रिया को ‘नए दौर का उपनिवेशवाद’ बताया है। उन्होंने सरकारों से संवाद के माध्यम से समाधान निकालने की अपील की है। आंदोलनकारी चाहते हैं कि विकास और संरक्षण के साथ स्थानीय लोगों के अधिकारों का भी सम्मान हो। इस मुद्दे ने दक्षिण भारत में पर्यावरण और सामाजिक न्याय को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
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