इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में ताहिर मेवाती नामक युवक को जमानत दे दी। उस पर ऑनलाइन भारत विरोधी और पाकिस्तान समर्थक पोस्ट डालने का आरोप था। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि सजा से पहले की हिरासत अनिश्चितकालीन नहीं हो सकती। यहां तक कि गंभीर आरोपों के मामले में भी नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए। ताहिर मेवाती मई 2025 से जेल में था। उसका दावा है कि उसे झूठे आरोपों में फंसाया गया है और सोशल मीडिया पर उसका फर्जी अकाउंट बनाया गया था। हाईकोर्ट ने इसी आधार पर जमानत याचिका स्वीकार कर ली। अदालत ने कहा कि जांच या मुकदमे की प्रतीक्षा में किसी को लंबे समय तक बिना दोष सिद्ध हुए जेल में नहीं रखा जा सकता। यह फैसला निजी स्वतंत्रता के अधिकार को मजबूत करता है। हालांकि, कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ जमानत दी है। उदाहरण के लिए, आरोपी को अदालत में उपस्थित होना होगा और सबूतों के साथ छेड़छाड़ नहीं करनी होगी। इस फैसले की कानूनी विशेषज्ञों ने सराहना की है क्योंकि यह पूर्व-परीक्षण निरोध पर संतुलन बनाता है। यह मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच तनाव को भी दर्शाता है। अब निचली अदालत आरोपों के गुण-दोष के आधार पर मुकदमा आगे बढ़ाएगी।
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