अल्लाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक संपत्ति बिक्री मामले में यह स्पष्ट किया कि पिता के बाद माँ ही बच्चे की प्राकृतिक अभिभावक होती है। यह फैसला तब आया जब पिता ने अपने वसीयत में अपने बच्चों के अधिकारों को सीमित करने की कोशिश की, जिससे अदालत ने सम्पत्ति के अधिकारों की स्पष्टता के साथ साथ अभिभावकत्व के सिद्धांत को भी पुनः स्थापित किया। न्यायालय ने कहा कि भारतीय वाणिज्यिक कानून में माँ को प्राथमिकता देना बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिये आवश्यक है, और वह शारीरिक व नैतिक दोनों रूप से बच्चे की देखभाल में सबसे उपयुक्त होती है। इस निर्णय से यह स्पष्ट होता है कि पिता के पास सिर्फ़ आर्थिक अधिकार हों तो भी माँ को बच्चे के जीवन में प्रमुख भूमिका निभाने का अधिकार है। अदालत ने भविष्य में ऐसे मामलों में माँ को प्राकृतिक अभिभावक मानने की दिशा में एक precedent सेट किया है, जिससे बच्चों के हितों की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।